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: ऐसे हुआ सेंगोल' का श्रृजन, न्याय दंड के रूप में भगवान शिव की प्रतिमाओं में है प्रमाण..

Admin Sun, May 28, 2023

ऐसे हुआ सेंगोल' का श्रृजन, न्याय दंड के रूप में भगवान शिव की प्रतिमाओं में है प्रमाण.. देश के लिए ऐतिहासिक क्षण है। नए संसद भवन का रविवार, 28 मई, 2023 को एक ऐतिहासिक परंपरा के साथ उद्घाटन हुआ। पहली बार देश के सर्वोच्च भवन में युगों से जुड़ी एक परंपरा का निर्वाह भी किया गया। इसे तमिल में सेंगोल कहा जाता है और इसका अर्थ संपदा से संपन्न और ऐतिहासिक है। यहां हम सेंगोल की हजारों साल पूरी मान्यता, परंपरा, इसकी शुरूआत, सेंगोल के हर भाग के वर्णन और निर्माण की जानकारी दे रहे हैं जो हमारे शास्त्रों में दिया गया है। इसका प्रमाण युगों पुराने ऐतिहासिक, शैक्षणिक, धार्मिक स्थलों की प्रतिमाओं से मिलता है। इसे किसी भी हालत में झुठलाया नहीं जा सकता। सेंगोल सोने और चांदी से बना एक दंड है। इसके शीर्ष पर शंखाकृति के उपर भगवान शिव के वाहन नंदी (न्याय के प्रतीक स्वरूप) विराजमान हैं। ऐसे तैयार होता है शंख.. भारत में शंख को बहुत ही पवित्र माना गया है। शंख नदी और समुद्र में पाया जाता है जो बहुत ही गंदे घोंघे का खोल होता है। प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत यह धीरे-धीरे उस घोंघे की विष्ठा से बनता जाता है। भगवान विष्णु ने सबसे पहले इसकी खासियत बताई अति प्राचीन काल में भगवान विष्णु ने सबसे निकृष्ट और परित्यक्त घोंघे के इस खोल को हाथ में लिए.. मुंह से लगाए और फूंक मारी..। भगवान विष्णु ने इसका रहस्य बताया कि.. इसको फूंकने से सांस फूलने की बीमारी नहीं होती है। वातावरण शुद्ध होता है। नकारात्मक लहर, उर्जा दूर हो जाती है। लोगों को नित्य ही इसे फूंकना चाहिए। भारत के ऋषियों ने विष्णु द्वारा बताए हुए रहस्य को उपासना पद्धति से जोड़ दिया ताकि लोग आरती के पूर्व 3 बार इसे फूंक सकें। सेंगोल’ शब्द संस्कृत के इसी ‘संकु’ (शंख) से आया कालान्तर में इसका उपयोग इन्द्र ने देव-असुर के युद्ध क्षेत्र में रणभेरी के रूप में किया। महाभारत में कृष्ण का पांच्जंन्य शंख आज भी चर्चित है। सेंगोल’ शब्द संस्कृत के इसी ‘संकु’ (शंख) से आया है सेम्मई के उपर शिव का नंदी, जिसका अर्थ है 'नीतिपरायणता' कालांतर में शंख की आकृति नीति निर्धारण तत्व को प्रदर्शित करने के प्रतीक के रूप में मंदिरों के प्रवेश द्वार और राजदंड के शीर्ष पर उत्कीर्ण और प्रचलित होने लगी। दक्षिण भारत में संस्कृत के सबसे निकट तमिल होने के कारण संकु (शंख) को नीति निर्धारण तत्व को दर्शित करने में भी 'सेम्मई' के लिए प्रयुक्त होने लगा। सेम्मई के उपर शिव का नंदी स्थापित किया गया जिसका अर्थ है 'नीतिपरायणता'। इसी सेम्मई का अपभ्रंश सेंगोल है जो कलांतर में राजदंड के रूप में प्रयोग में लाया जा न्याय दंड के रूप में शिव की अनेक प्रतिमाओं में प्रमाण सेंगोल वस्तुत: शिव से जुड़ा है, शिव संहारक हैं जो संहार के पूर्व यह सुनिश्चित करते हैं कि संहार पूर्णत: न्यायोचित है इसलिए सेंगोल शिव के साथ न्याय दंड के रूप में भी रहा है। शिव की कई प्रतिमाओं में शिव के एक हाथ में सेंगोल रहता है। राजदण्ड लेकर राजसिंहासन पर बैठता था राजा प्राचीन काल में भारत में ऐसा होता था कि जब राजा का राज्याभिषेक होता था, तो विधिपूर्वक राज्याभिषेक हो जाने के बाद राजा राजदण्ड लेकर राजसिंहासन पर बैठता था। राजसिंहासन पर बैठने के बाद वह कहता था कि अब मैं राजा बन गया हूं।' अदण्ड्योऽस्मि, अदण्ड्योस्मि, अदण्ड्योऽस्मि'। (मैं अदण्ड्य हूं, मैं अदण्ड्य हूं, मैं अदण्ड्य हूं, अर्थात मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता।) पुरानी विधि ऐसी थी.. वहीं पुरानी विधि ऐसी थी कि उनके पास एक संन्यासी खड़ा रहता था लंगोटी पहने हुए। उसके हाथ में एक छोटा, पतला सा पलाश का डण्डा रहता था। वह उससे राजा पर तीन बार प्रहार करते हुए उसे कहता था कि 'राजा! यह 'अदण्ड्योऽस्मि अदण्ड्योऽस्मि' गलत है। 'दण्ड्योऽसि दण्ड्योऽसि दण्ड्योऽसि' अर्थात तुझे भी दण्डित कर सकता है। चोल साम्राज्य में सेंगोल शब्द प्रयोग कुलमिलाकर सेंगोल भारत का एक प्राचीन स्वर्ण राजदण्ड है। चोल साम्राज्य में सेंगोल शब्द प्रयोग होता रहा है। सेंगोल वह है जो एक प्रकार का राजदण्ड है जिसे हस्तान्तरित किया जाता है, उससे न्यायपूर्ण शासन की अपेक्षा की जाती है। राजदंड सौंपने के दौरान 7वीं शताब्दी के तमिल संत थिरुग्नाना संबंदर द्वारा रचित एक विशेष गीत का गायन भी किया जाता था। मौर्य, गुप्त वंश और विजयनगर साम्राज्य में भी सेंगोल का प्रयोग किए जाता रहा है। न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था के अभिप्राय से है सेंगोल "सेंगोल वस्तुत: न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था के अभिप्राय से है न कि सत्ता हस्तांतरण से।" सत्ता हस्तांतरण में सेंगोल का उपयोग होना न्यायोचित शासन व्यवस्था के प्रतीक के रूप में है न कि राजशाही को दर्शाने के लिए कि जिसमें एक राजा का दूसरे राजा को राज्य की बदली के लिए सेंगोल दिया जाता हो। वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू से सवाल किया था 1947 में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से एक सवाल किया था: "ब्रिटिश से भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में किस समारोह का पालन किया जाना चाहिए?" इस प्रश्न ने नेहरू को वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी सी राजगोपालाचारी (राजाजी) से परामर्श करने के लिए प्रेरित किया। सेंगोल' तैयार करने चेन्नई में सुनार को दी थी जिम्मेदारी राजाजी ने चोल कालीन समारोह का प्रस्ताव दिया जहां एक राजा से दूसरे राजा को सत्ता का हस्तांतरण उच्च पुरोहितों की उपस्थिति में पवित्रता और आशीर्वाद के साथ पूरा किया जाता था। राजाजी ने तमिलनाडु के तंजौर जिले में शैव संप्रदाय के धार्मिक मठ- थिरुववादुथुराई अधीनम से संपर्क किया। थिरुववादुथुराई अधीनम 500 वर्ष से अधिक पुराना है और पूरे तमिलनाडु में 50 शाखा मठों को संचालित करता है। अधीनम के नेता ने तुरंत पांच फीट लंबाई के 'सेंगोल' तो तैयार करने के लिए चेन्नई में सुनार वुम्मिदी बंगारू चेट्टी को नियुक्त किया था। लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था ऐसा दावा है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात 14 अगस्त 1947 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत गणराज्य के ऑफ रिकॉर्ड में प्रथम प्रधानमंत्री कोई और थे, पर ऑन रिकॉर्ड के अनुसार पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इस राजदण्ड सेंगोल को सौंप दिया था। बाद में इसे इलाहाबाद संग्रहालय में रख दिया गया। वर्तमान में भारत की संसद भवन की नई इमारत में इसकी स्थापना के चलते यह सुर्खियों में बना हुआ है। गहन जांच के बाद देश के सामने रखने का निर्णय सेंगोल ने हमारे इतिहास में एक अहम भूमिका निभाई थी। इसकी जानकारी पीएम नरेंद्र मोदी को मिली तो इसकी गहन जांच करवाई गई। फिर निर्णय लिया गया कि इसे देश के सामने रखा जाना चाहिए। इसके लिए नए संसद भवन के लोकार्पण के दिन को चुना गया। सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक सेंगोल को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संसद भवन में स्थानांतरित किया गया

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